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Friday, November 29, 2019

नारी शक्ति

बेटी अब ऐसे बचाना होगा कि ,
दोषी को जिन्दा जलाना होगा।।
मांगने से अब न मिलना जुलना कुछ
न्याय अब खुदसे हि पाना होगा
शर्म भी शर्मिंदा होता देख कर 
कोई बच्ची जा रहा है फेंक कर
हम भला है चुप्पी साधे किसलिए
चीखेंगे क्या अब अपनी बच्ची देखकर
बेटीयों को दोष देना छोड़ दो, अब
गलत बेटे का भी मुह तो तोड़ दो
बेटी को भी बेटे तो  प्यार दो, औ
बेटे को भी बेटी सा संस्कार दो
बेटी को  इज्ज़त अगर न दे सके
ऐसे बेटे इससे अच्छा मार दो।।
इनका तो ऐसे ही अब उपचार होगा 
दोषी के सीने से खंज़र पार होगा ।।
बेटी अब ऐसे बचाना होगा, कि
दोषी को जिन्दा जलाना होगा।।
दोषी को जिन्दा........

                ।। विक्रम सिंह ।।

Monday, November 25, 2019

गज़ल

ख्वाहिशें होने पर सब सांथ सांथ चलते हैं
काम निकल जाने पर ये हुज़ूर कहां मिलते हैं

यूं तो इनके बिना,इक दीवार भी नहीं बनती
पर, मकां बन जाने पर मजदूर कहां दिखते हैं

हर छोटा सख्श ही हरदम,गुनहगार होता है
बड़े बन जाने पर कसूर, कहां दिखते हैं

भूंखे रातें बीतती हैं कितनी बीरानी सड़कों पर
सस्ती किस्तों में, तज़ुर्बे कहां मिलते हैं 

 ।। विक्रम सिंह ।।

कब भला संभलो गे तुम????

 अब तो आखिरि मोड़ पर आके खड़े हो,

अब नहीं तो कब भला संभलोगे तुम।
पाँव फिसलेगा जो फिर
या फिर से जो जाओगे गिर
 या एक अकेली रात में,
भूतों से जब जाओगे घिर
अब तो तुम पर चाँदनी भी है चीखती,
इस अँधेरे से  कब भला निकलोगे तुम।

अब तो आखिरि...........

आज कल की आंधिया भी मौन है,
कौन पूछेगा भला तू कौन है
अब सारे मुसाफ़िर लौटते है
आते जाते लोग तुमको टोकते है
होगा कब एहसास तुमको सत्य का 
कब धन के माया मोह से निकलोगे तुम।
अब तो आखिरी मोड़ पर आके खड़े हो

अब नहीं तो कब भला संभलोगे तुम।।
अब नहीं तो कब भला संभलोगे तुम।।

                ।।      विक्रम सिंह  ।।


Sunday, November 24, 2019

नारी शक्ति

म्यान से फिर तलवार निकाल प्रहार करो
बन चंडी,तुम असुरों का संहार करो

तुम सहमी हो? वो सहमें कुछ ऐसा हो
हे!द्रौपदी तुम काली का अवतार धरो

जिंदा हो तो होने का एहसास कराओ
मार छलंगी बहता दरिया पार करो

सब की सुनकर कौन है? आगे बढ़ पाया
खुद की सुन ,और पांव चांद के पार धरो

।। विक्रम सिंह ।।


हृदय हुंकार

प्रियतम के निकट न होने पर
हिय में हिलोर खुब उठता है
मन कुंठित हो के पल में ही
कितनी कहानियां गढ़ता है
ये प्रेम है या फिर पीड़ा है
या प्रेम की खातिर पीड़ा है
जब नयन मुंदे तो राधा सी
खुलते ही होती मीरा है।
जब, कुछ पल मिलने की आस जगे
न जाने कैसी आग लगे
पल भर पहले तो दूर थी वो
अब इस पल मुझको पास लगे
दुनिया दारी से लड़ कर जब
प्रिय को बांहों में भींच लिया
 फिर यों प्रतीत हुआ जैसे
हमने  भी लंका जीत लिया
तन से तन औे मन से मन
जब दोनों मिलने लगते है
तन मन का हर एक कोना तक
झन झन झन करने लगते है
अधरों से अधर मिले फिर यूं
 ढलते सूरज की बेला में
जाने कितनी अनुभूति हुई
दोनों हृदयों की मेला में
साम से लेकर शहर तलक
दिल बिल्कुल शोर न करता है
पर ,प्रियतम के निकट न होने पर
हिय में हिलोर खुब उठता है।।

।। विक्रम सिंह ।।