ख्वाहिशें होने पर सब सांथ सांथ चलते हैं
काम निकल जाने पर ये हुज़ूर कहां मिलते हैं
यूं तो इनके बिना,इक दीवार भी नहीं बनती
पर, मकां बन जाने पर मजदूर कहां दिखते हैं
हर छोटा सख्श ही हरदम,गुनहगार होता है
बड़े बन जाने पर कसूर, कहां दिखते हैं
भूंखे रातें बीतती हैं कितनी बीरानी सड़कों पर
सस्ती किस्तों में, तज़ुर्बे कहां मिलते हैं
।। विक्रम सिंह ।।
No comments:
Post a Comment