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Monday, November 25, 2019

गज़ल

ख्वाहिशें होने पर सब सांथ सांथ चलते हैं
काम निकल जाने पर ये हुज़ूर कहां मिलते हैं

यूं तो इनके बिना,इक दीवार भी नहीं बनती
पर, मकां बन जाने पर मजदूर कहां दिखते हैं

हर छोटा सख्श ही हरदम,गुनहगार होता है
बड़े बन जाने पर कसूर, कहां दिखते हैं

भूंखे रातें बीतती हैं कितनी बीरानी सड़कों पर
सस्ती किस्तों में, तज़ुर्बे कहां मिलते हैं 

 ।। विक्रम सिंह ।।

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