प्रियतम के निकट न होने पर
हिय में हिलोर खुब उठता है
मन कुंठित हो के पल में ही
कितनी कहानियां गढ़ता है
ये प्रेम है या फिर पीड़ा है
या प्रेम की खातिर पीड़ा है
जब नयन मुंदे तो राधा सी
खुलते ही होती मीरा है।
जब, कुछ पल मिलने की आस जगे
न जाने कैसी आग लगे
पल भर पहले तो दूर थी वो
अब इस पल मुझको पास लगे
दुनिया दारी से लड़ कर जब
प्रिय को बांहों में भींच लिया
फिर यों प्रतीत हुआ जैसे
हमने भी लंका जीत लिया
तन से तन औे मन से मन
जब दोनों मिलने लगते है
तन मन का हर एक कोना तक
झन झन झन करने लगते है
अधरों से अधर मिले फिर यूं
ढलते सूरज की बेला में
जाने कितनी अनुभूति हुई
दोनों हृदयों की मेला में
साम से लेकर शहर तलक
दिल बिल्कुल शोर न करता है
पर ,प्रियतम के निकट न होने पर
हिय में हिलोर खुब उठता है।।
।। विक्रम सिंह ।।
हिय में हिलोर खुब उठता है
मन कुंठित हो के पल में ही
कितनी कहानियां गढ़ता है
ये प्रेम है या फिर पीड़ा है
या प्रेम की खातिर पीड़ा है
जब नयन मुंदे तो राधा सी
खुलते ही होती मीरा है।
जब, कुछ पल मिलने की आस जगे
न जाने कैसी आग लगे
पल भर पहले तो दूर थी वो
अब इस पल मुझको पास लगे
दुनिया दारी से लड़ कर जब
प्रिय को बांहों में भींच लिया
फिर यों प्रतीत हुआ जैसे
हमने भी लंका जीत लिया
तन से तन औे मन से मन
जब दोनों मिलने लगते है
तन मन का हर एक कोना तक
झन झन झन करने लगते है
अधरों से अधर मिले फिर यूं
ढलते सूरज की बेला में
जाने कितनी अनुभूति हुई
दोनों हृदयों की मेला में
साम से लेकर शहर तलक
दिल बिल्कुल शोर न करता है
पर ,प्रियतम के निकट न होने पर
हिय में हिलोर खुब उठता है।।
।। विक्रम सिंह ।।
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