अब तो आखिरि मोड़ पर आके खड़े हो,
अब नहीं तो कब भला संभलोगे तुम।
पाँव फिसलेगा जो फिर
या फिर से जो जाओगे गिर
या एक अकेली रात में,
भूतों से जब जाओगे घिर
अब तो तुम पर चाँदनी भी है चीखती,
इस अँधेरे से कब भला निकलोगे तुम।
अब तो आखिरि...........
आज कल की आंधिया भी मौन है,
कौन पूछेगा भला तू कौन है
अब सारे मुसाफ़िर लौटते है
आते जाते लोग तुमको टोकते है
होगा कब एहसास तुमको सत्य का
कब धन के माया मोह से निकलोगे तुम।
अब तो आखिरी मोड़ पर आके खड़े हो
अब नहीं तो कब भला संभलोगे तुम।।
अब नहीं तो कब भला संभलोगे तुम।।
।। विक्रम सिंह ।।
Bhai ham na sudharenge
ReplyDeleteJindabad
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